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साज़्जन

साज़्जन

लघु 2026-09-08 · 3 मिनट पठन

जुलाई की उनतीस

शेन बुआजी की याददाश्त साल-दर-साल कमज़ोर होती जा रही थी—बेटी जो कहकर जाती, वह उसी के पीछे-पीछे भूल जाता। पर बीस-पच्चीस साल पहले की वह दोपहर आज भी उसे साफ़ याद है। झींगुरों की आवाज़ें चारों ओर छाई थीं, और कस्बे के अस्पताल के बूढ़े डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप उतारते हुए, भौंहें सिकोड़कर कहा था—दिल की धड़कन बेतरतीब हो गई है, आराम करो।

वह हाथ हिलाकर हँस दिया—आदमी के शरीर के ये पुर्ज़े, कभी-कभी बज जाते हैं, कुछ होता नहीं। हाथ का काम इंतज़ार नहीं करता।

बाद में पता चला कि इंतज़ार उसका अपना था। सत्रह में दिल की द्वार (वाल्व) ख़राब हो गईं, एक और ऑपरेशन हुआ। डॉक्टर ने आराम की सलाह दी, वह ज़ुबान पर हामी भरता, मुड़ते ही वही ढंग से। दिल एक बूढ़ी धौंकनी की तरह, ज़रूरत से ज़्यादा खिंचते-खिंचते पतला होता गया। डॉक्टर ने अंक गिनाए—बहत्तर में से तेईस, आधे इंसान से भी कम। उसे “बहत्तर” समझ नहीं आया, सिर्फ़ “आधा” समझ आया—इस दिल में अब आधी ही ताक़त बची है।

अस्पताल में पहली रात बेटी ने उसके हाथ में एक कॉपी दी—“बाबा, रोज़ कुछ पंक्तियाँ लिखो। दिल की बातें कहीं तो जाएँ।”

वह लिख नहीं सकता था। पहले कुछ पन्नों पर उसने पेंसिल से बस लकीरें खींचीं—दिन में एक, हिसाब की खाता-बही की तरह।

चौदह अगस्त

आधी रात को दिल घबराया। वह उठ बैठा, और अँधेरे में अपनी धड़कनें सुनने लगा—किसी टूटे-फूटे बूढ़े घर की तरह बेतरतीब। पास में आशू गहरी नींद में थी। उसने चुपचाप कम्बल का किनारा उसकी ओर तान दिया।

सुबह फ़ोन आया। सुनकर वह फ़ोन थामे, देर तक कुछ नहीं बोला।

मैच हो गया। दिल मिल गया।

ख़ुशी सचमुच की ख़ुशी थी, और डर भी सचमुच का डर। वह दिल आया क्योंकि कोई चला गया था; उसके परिवार ने अपनी सबसे भारी चीज़ जिम्मेदारी सौंप दी थी। आधी ज़िंदगी में उसने कभी किसी का उधार नहीं लिया था—पहली बार, ऐसा क़र्ज़ लगा था जिसका उत्तर उसे समझ नहीं आता था।

उस रात उसने कॉपी में दो पंक्तियाँ लिखीं—अस्पताल आने के बाद पहली बार पूरे वाक्य:

“किसी का उधार लिया है। किससे चुकाऊँ।”

उन्नीस अगस्त

आँख खुली तो उन्नीस तारीख़ थी। सीने पर पट्टियाँ थीं, बेचैन दर्द था—पर वह नहीं चिल्लाया। पानी माँगा, पीने से पहले ही हाथ सीने पर रख लिया।

धक्, धक्, धक्।

ठहरी हुई। सँवरी हुई। पर अपरिचित।

यह दिल जवान था, भरपूर ताक़त के साथ—जिस तरह जवान लड़का मेले की ओर दौड़ता है। वह धीरे से उससे बोला: आगे से, तुम्हारा ही भरोसा है। फिर उस पुराने दिल का ध्यान आया, जिसने सारी उम्र मेहनत की थी और अब आराम कर रहा था। वह रोया नहीं, बस दिल ही दिल में कह दिया: बहुत मेहनत की तुमने, धन्यवाद।

कॉपी बिस्तर के पास रखी थी। उसने तन उठाकर एक पंक्ति लिखी:

“उन्नीस अगस्त। दिल बदल गया। वह बड़ा ठहरा-ठहरा धड़कता है—मुझसे ज़्यादा हिम्मतवाला।”

अट्ठाईस अगस्त

अस्पताल से निकलने का दिन था, मौसम सुहावना था, गलियारे के अंत में खिड़की से धूप भरी आ रही थी। नर्स चेन पीछे भागी आई, हाथ में एक लिफ़ाफ़ा—“शेन बुआजी, किसी ने आपके लिए यह दिया है।”

वह समझ गया कौन था। हाथ नहीं काँपे—नए दिल में ताक़त कमी नहीं—पर लिफ़ाफ़ा खोलते वक़्त काँप गए।

चिट्ठी लंबी नहीं थी। वह धीरे-धीरे पढ़ता गया, आशू साथ-साथ पढ़ती गई, और उसने देखा कि उसकी आँखें भर आईं।

“प्रिय साज़्जन! अच्छी तरह जियो, ज़िंदगी को महसूस करो, दुनिया को देखो; अपनों से खूब प्यार करो, बहुत मेहनत मत करो। दुआ है कि आने वाली ज़िंदगी सुकून और ख़ुशहाली भरी हो।”

कुछ ही पंक्तियाँ थीं। पढ़कर गलियारा काफ़ी देर तक ख़ामोश रहा।

वह सोचता था कि यह क़र्ज़ वह झुकी गर्दन चुकाएगा, ज़िंदगी भर—हर मिलने वाले से तीन गुना छोटा होकर, जितना दिन जिएगा, उतना ही अदा करेगा। पर चिट्ठी में “बदला” शब्द एक बार भी नहीं आया था। उस इंसान ने अपनी क़िस्मत का दर्द निगल लिया था, और आगे सिर्फ़ दुआएँ बढ़ाई थीं—जैसे कोई बड़ा दूर जाते बच्चे को समझाता है: भली तरह खाना खाओ, सँभालकर चलो, ज़्यादा मत थको।

समझ आया—सबसे अच्छा हिसाब चुकाने का तरीक़ा झुकना नहीं, उठकर खड़े होना है। अपने दिन उस तरह बिताना, जैसे वह चाहता होगा।

उसने पूछा, जवाब लिख सकता हूँ? चेन ने कहा, हाँ—लाल क्रॉस के ज़रिए, नाम-पहचान नहीं होगी। वह थोड़ी देर सोचा, फिर बोला: “तो मेरी यह बात पहुँचा देना। दिल मिल गया, बातें भी मिल गईं। आगे की ज़िंदगी, मैं उसकी ओर से धीरे-धीरे जीता हूँ।”

रात में उसने कॉपी में लिखा:

“अट्ठाईस अगस्त, धूप। अस्पताल से छुट्टी। एक दिल मिला, एक बात भी मिली।”

सोलह सितंबर

वह जल्दी उठा, और नदी के किनारे धीरे-धीरे चला। पहले रास्तों में उड़न लगाता था—एक कदम दो के बराबर; अब कोई जल्दी नहीं। पहली बार उसने नदी का स्वभाव साफ़ देखा: इसमें कोई हड़बड़ी नहीं, पर वह चलती रहती है।

लौटते हुए किनारों (गुइहुआ) के केक दो ख़रीदे—आशू को पसंद हैं। उसने कहा, समुंदर देखना चाहती हूँ। पहले वह हमेशा कहता—यह काम निपट जाए, फिर चलेंगे। इस बार फ़ौरन जवाब दिया: “चलेंगे। बसंत आते ही चलेंगे।”

शाम को नीचे बैठकर उसने हाथ सीने पर रखा। धक्, धक्—बिना घबराहट, एक छोटे ढोल की तरह ठहरा हुआ। एक दिल, जिसका एक सिरा उससे जुड़ा था, दूसरा एक परिवार की दुआओं से—और अब एक ही सीने में, धक्-धक्-धक्, दो इंसानों की ओर से जी रहा था।

सोने से पहले लिखते समय क़लम पहले से बहती चली गई:

“सोलह सितंबर, धूप। धड़कनें ठहरी हुई, न तेज़ न धीमी। यह हिसाब आगे मैं तेरी ओर से दिन-ब-दिन लिखूँगा। दुनिया मैं तेरी ओर से देखूँगा, परिवार मैं तेरी ओर से प्यार करूँगा। आगे का हर सुकून और ख़ुशहाली—दोनों घरों की ओर से—मैं सच करके दिखाऊँगा।”

लिखकर उसने कॉपी बंद की। बाहर किनारे के फूल खिले हुए थे, उनकी महक लहर-दर-लहर खिड़की से भीतर आ रही थी। सीने का वह छोटा ढोल बजता रहा—धक्, धक्—

जैसे किसी ने धीरे से जवाब दिया हो: हँ।

(समाप्त)

यह कहानी एक वास्तविक घटना से प्रेरित है; सभी पात्र काल्पनिक नाम हैं।

वास्तविक घटना पर आधारित

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